एक मासूम सज़ा
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यह कहानी है हिंदुस्तान के शहंशाह अकबर की और उसके वफादार और चतुर सलाहकार - बीरबल की.
दिन सुहाना था. अकबर के महल के दरबार में उनके सलाहकार उनके इंतज़ार में खड़े बातें कर रहे थे. बहुत जल्द अकबर आये, लेकिन वह आज हमेशा जैसे अच्छे मिजाज़ में नहीं थे. वे परेशान थे. अकबर का गंभीर चहरा देखकर उनके सलाहकार शांत हो गए.
"बात क्या है, जहापना? क्या आप को कोई तकलीफ है?" एक सलाहकार ने पुचा.
"आज किसीने मेरी मूंछें नोचने की जुर्रत की!" अकबर चिल्लाये. "आपको क्या लगता है, क्या सज़ा दी जाए उस बदमाश को?" अकबर ने अपने सलाहकारों को पूंछा.
एक एक कर, उन सब ने शेहेंशाह की मूछें खींचने वाले बदमाश के लिए भारी से भारी सज़ा सुझाई.
"उसे चौराहे पर फांसी पे चढ़ा दिया जाए!" एक ने कहा.
"उसका सर काट दिया जाए!" दूसरा चिल्लाया.
"उसे सौ बार चाबुक से मारा जाये!" तीसरे ने जिद्द की.
शेहेंशाह ने सबकी बातें सुनी पर उन्होंने देखा की उनके सबसे भरोसेमंद सलाहकार ने अब तक कुछ नहीं कहा था.
"बीरबल, तुम्हे कुछ नहीं कहना इस बात पर?" उन्होंने पूंछा.
बीरबल ने शांत चित्ती से कहा, "माफ़ कीजिये जहापना. मैं सुझाई हुई किसी भी सज़ा से सहमत नहीं हूँ",
अकबर बिलकुल चौक गए और उन्होंने अपने वफादार सलाहकार को पूछा, "तुम इस जुर्म के लिए क्या सज़ा सुझाते हो?"
"मुझे लगता है," बीरबल ने कहा, " की जिसने आपकी मूंछे खींचने की जुर्रत की, उसे मिठाई का डिब्बा दिया जाए."
यह सुन कर, दरबार में फिर से बातें होनी लगी. दुसरे सलाहकार बीरबल का सुझाव सुन कर चौक गए. वे सब सोचने लगे की ऐसा वफादार सलाहकार शेहेंशाह को बदमाश को मिठाई का डिब्बा देने का सुझाव कैसे दे सकता है.
"जरूर," उन्होंने विरोध किया, "यह सही सज़ा नहीं है!"
गडबडाकर शेहेंशाह ने पूंछा: "बीरबल, तुम ऐसी सज़ा क्यों सुझा रहे हो?"
"जहापना, सिर्फ आपका बेटा - राजकुमार ही आपकी मूंछे नोचने की जुर्रत कर सकता है. वह आपकी गोद में खेलता है, और आज उसने खेलते हुए आपकी मूंछे खींच लीं होंगी. ऐसे मासूम गुनेहगार को सिर्फ एक मासूम सज़ा दी जानी चाहिए. मेरा सुझाव है की आप नादान राजकुमार को एक मिठाई का डिब्बा दें."
बीरबल के चतुर प्रत्युत्तर ने शेहेंशाह के चेहरे पर मुस्कराहट लायी.
तुम सही हो, मेरे यार," शेहेंशाह अकबर बोले. "वह मेरा बेटा ही था. और उसे जरूर सज़ा की तौर पर एक मिठाई का डिब्बा ही मिलेगा!", अकबर ने कहा.
बीरबल मुस्कुराये जब की स्तिथि न समझकर भारी सज़ा सुझाने की शर्म से बाकि सलाहकार आँखें न मिला पाएं.
और आज तक, बीरबल की चतुराई और होशियारी के किस्से पीढ़ी दर पीढ़ी को दोहराए जाते है.
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