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दान करना Vimal Shinagadia    
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दान करना

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दान करना

 

 

 

 

 

 

 

एक बार, एक बहुत बलवान और उदार राजा था जो अपना बहुत सा सोना अपने राज्य के गरीब लोगों को दान करता था. हर सुबह, राजा जल्दी उठ कर अपना सोना उसके महल के दरवाज़ों के पास खड़े गरीबों में बाँटता था, ताकि वे खाना और कपडे खरीद सके.

एक रात, एक किसान महल के पास आया और दिवार से चिपक कर छुप गया. किसान ने सोचा की वह रात भर महल के दरवाज़ों के पास रहेगा और फिर सुबह राजा से सोना पाने के लिए कतार में सब से आगे होगा. “अगर में सबसे पहले गया,” किसान ने सोचा, “तो शायद राजा मुझे ज्यादा सोना देगा और फिर मैं कभी गरीब या भूखा नहीं रहूँगा.”

लेकिन जब राजा के महल के एक चौकीदार ने किसान को महल के दरवाज़ों के पास छुपा हुआ देखा, उसने सोचा की यह आदमी चोर ही होगा, जो राजा से उसका सोना रात में चुराने के लिए आया है. और इसलिए उस चौकीदार ने उस किसान को पकड़ा और उसे महल के निचे कैद खाने में बंध कर दिया.

अगली सुबह, पिछली रात का किस्सा सुनकर, उस उदार राजा ने जा कर कैद खाने में बंद किसान से बात करने की ठान ली.

राजा ने उस अँधेरे और उदास कैद खाने में प्रवेश किया और किसान से पूछा, “तुम मुझ से चोरी क्यों करना चाहते थे जब की तुम्हे अपने आप को भोजन और कपडे दिलवाने के लिए सिर्फ मुझसे सोना माँगना था; क्या तुम्हे पता नहीं की मैं यह तुम्हे ख़ुशी से दान करता?”

उस गरीब आदमी ने समझाया की वह कोई चोर नहीं था, सिर्फ एक किसान था जो बुरे समय से गुज़र रहा था और जिसे मदद की ज़रुरत थी. “मैं एक ज़माने में एक अच्छा किसान और एक अच्छा व्यापारी था”, उस आदमी ने कहा, “लेकिन फिर अकाल पड़ा और चोरों ने मेरी मावेशी चुराई.”

उस किसान ने सीधे राजा की तरफ देखा. “मैं आप से चोरी करने नहीं आया था,” उसने जिद्द की, “मैं रात में इसलिए आया की इस तरह मुझे सुबह सबसे पहले सोना मिल पाए. बस उतना ही, कसम से”.

किसान की यह कहानी उस उदार राजा के दिल को छु गयी. उसने अपने सिपाहियों को उस आदमी को कैद खाने से छुड़ाने का हुकुम दिया, और फिर उसने उस किसान को दस सोने के सिक्के दिए जिससे वह अपनी ज़िन्दगी बना सके. किसान ने उदार राजा को शुक्रिया अदा किया और अपना सोना लेकर महल से बाहर निकला.

लेकिन अगले दिन, किसान अपने दस सोने के सिक्कों से संतुष्ट नहीं था. हर रात वह महल के दरवाज़ों के पास इंतज़ार करता था, और हर सुबह वह उदार राजा उसे और दस सोने के सिक्के प्रदान करता था.

यह कई दिनों तक चलता गया, आखिर राजा ने किसान से पूछा, “जब मैंने तुम्हे इतना सोना दिया है, तो तुम अब तक मेरे महल में क्यों आते हो, ज़रूर तुम अब तक गरीब या भूखे नहीं हो?”

“लेकिन मैं आपके जैसा बनना चाहता हूँ”, किसान ने राजा से कहा. “मैं भी आमिर और बलवान बनना चाहता हूँ’.

‘मगर क्या तुम भी इस राज्य के गरीबों की मदद करोगे?’, राजा ने पूछा.

किसान ने जवाब देने से पहले कुछ देर इस सवाल के बारे में सोचा. “जी ज़रूर करूँगा, हुज़ूर”.

‘तो फिर मैं तुम्हे अपना आधा राज्य और आधा धन देता हूँ,’ राजा ने कहा, ‘लेकिन तुम्हे वादा करना होगा मुझसे की तुम हमेशा उनकी मदद करोगे जिन्हें तुम्हारी मदद की ज़रुरत हो.’

किसान ने बात मानी, और फिर राजा ने अपना आधा धन और अपना आधा राज्य उसे दे दिया.

कई साल गुज़र गए और वह किसान एक होशियार और उदार आदमी ज़ाहिर हुआ. उसने अपना बहुत सारा सोना, अन्न और मावेशी के लिए दान दिया, और बहुत ही जल्द, उसने अपना धन दुगना कर दिया और अपने राज्य के गरीबों को और भी ज्यादा धन देने लगा.

राजा अपने महल से यह सब देखकर बहुत खुश हुआ. उसे पता था की दूसरों के देने में ही दुनिया का सबसे बड़ा सुख है. जो अपना था वह दूसरों के साथ बाँट कर, वह उदार राजा सब को खुश रख पाया. किसान ने भी यह सबक अच्छी तरह सीखा था और वह भी अपना धन और अपनी खुशियाँ दूसरों के साथ बांटता था. और जल्द ही, क्योंकि दोनों, राजा और वह होशियार किसान, इतने उदार हो कर देते थे, उस राज्य में से सारी गरीबी और भूक मिट गई.

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