लैला-मजनूं
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कायस इब्न अल-मुलाव्वाह एक लड़का था जो लैला अल-आमिरिया से प्यार करता था। उसे उसके प्यार में यकींन हो गया था उसी दिन, जब उसने पहली बार लैला को अपनी आँखों से देखा था। जल्द ही उसने अपने और लैला के प्यार पर कविताए बनाना शुरू कर दी और सड़क पर, वह ज़ोरो से उन कविताओं को दोहराता, उस के लिए जो उन्हें सुनना चाहे। इस उत्साही दीवानगी का प्रदशन की वजह से, लोगो ने उसे मजनूं का नाम दिया, मतलब एक दीवाना।
एक दिन, हिम्मत जुटते हुए, मजनूं ने लैला के पिताजी से शादी का हाथ माँगा परन्तु लैला के पिताजी ने इंकार कर दिया।, उन्होंने लैला किसी पागल इंसान से शादी नही करेंगी। लैला के पिताजी ने ऐसा कहकर इंकार कर दिया की इसे एक कलंक लग जायेगा। उन्होंने ये भी कहा के उनकी बेटी के लिए अच्छा नहीं है अगर वह एक ऐसे आदमी से शादी करे जिसे सब 'पागल दीवाना' कहकर पुकारते हो।. इसके बाद लैला की शादी किसी और से तेय करदी गयी।
इस दुःख में मजनूं ने अपना घर और परिवार छोड़ दिया और जंगलों में गायब हो गया। जानवरो के संग जहाँ वह लैला के लिए कवितायेँ बनाते हुए, उसने एक एकांत से भरा दुखी जीवन जिया। लैला को ज़बरदस्ती से किसी और से शादी करनी पड़ी थी। लैला अपने पति से प्रेम नहीं करती थी क्योंकि उसके दिल में तभी भी सिर्फ मजनूं के लिए जगह थी पर वह फिर भी एक वफादार पत्नी थी।
लैला की यह शादी टी स्तिथि देखते हुए, मजनूं ने अपना एकांत जीवन जारी रखा जिसके कारण वह अपने घर और माता-पिता के पास नहीं लौटना चाहता था।
हर दिन, मजनूं के माता-पिता उसे बेहद याद करते थे और उसका घर लोटने का इंतज़ार करते थे। वह उसके लिया खाना तक द्वार के बहार रखते थे उस उम्मीद में के वह शायद एक दिन तोह ज़रूर लोटे गा। पर मजनूं अपनी कविताएं लिखते, वहीँ था एकांत में।
जानवरो के सुरक्षित संग, मजनूं ने अपना सारा समय एकेले बिताया था। शहर की तरफ बढ़ते हुए, कई यात्री ने उसे देखा था। यात्री कहते थे के मजनूं अपना समय अपनी कविताएं दोहराते और लिखते हुए निकालता था। उनके अनुसार, वह वाकई में एक दीवाना बन गया था जिसका दिल टुटा हुआ था।
कई साल बीते, मजनूं के माता-पिता गुज़र गए थे। मजनूं को अपने माता-पिता के प्रति कितना सामान और प्रेम था वह बात लैला जानती थी और यह जानते हुए उसने उनके गुज़र जाने की खबर, मजनूं को पहुँचाना चाहती थी।
अंत में, एक बूढ़े आदमी ने लैला को बताया के उन्होंने मजनूं को रेगिस्तान में देखा था। लैला की खूब सिफारिश के बाद बूढ़े आदमी ने वचन दिया के वह जब दूसरी बार मजनूं को देखे तोह वह संदेसा दे दीन्हे।
एक दिन, उस बूढ़े आदमी की मुलाकात मजनूं से हुई। संदेशा प्रस्तुत करते समय, इस युवी कवी को टूटते हुए देखना पड़ा।
अफ़सोस और दुःख महसूस करते हुए, मजनूं ने अपने आप को दुनिया से दूर कर दिया और खुद को वचन दिया के वह अपनी अंतिम सांसे नहीं लेते तब तक वह रेगिस्तान को नहीं छोड़ेंगे।
कुछ सालों बाद, लैला के पति की मृत्यु हो गई थी। वह उस उम्मीद में थी के अब वह और मजनूं हमेशा के लिए एक हो सकते है। परन्तु ऐसा नहीं हुआ। परंपरा के अनुसार, लैला को अपने घर में ही रहकर, दो साल के लिए, अपने मरे हुए पति का शोक माननी थी, बिना किसी औरमिले। यह सोच के वह दो साल तक मजनूं को नहीं मील पायेगी, उससे बर्दाश नहीं हो सका। पूरी ज़िन्दगी अलग रहकर, वह और दो साल मजनूं से अलग रहना सही उससे उपरांत उसे अपनी मृत्यु सेहना आसान लगा। लैला ने अपने टूटे हुए दिल के वजह से अपना दम खो दिया, एकेले अपने ही घर में, बग़ैर मजनूं को मिले।
लैला की मौत की खबर सुनते ही मजनूं पागल हो गया। जहाँ लैला को दफनाया गया था वह वहां गया। उसने अपने आप को इस दुःख में अपने आप को अभ्यर्पण कर दिया। उसके आंसू तब तक बहते रहे जब तक उसने अपनी अंतिम साँसे अपनी प्रेमी की कब्रे के पास गिनी।
“मै इन दीवारों से गुजरता जाऊंगा, जिनसे लैला गुजरती है
और मै इस और उस दीवार को चूमता हूँ,
यह मेरे दिल में दीवारों के प्रति प्यार नही है जो मेरे दिल को खुश करता है
लेकिन जो उन दीवारों के पास से चलकर मेरा ध्यान आकर्षित करती है, उससे मुझे प्यार है।”